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मत पूछो कैसे गुजरता है हर पल तुम्हारे बिना,

कभी बात करने की हसरत
कभी देखने की तमन्ना...❗❗

कैसे गुजरती है हर शाम मेरी तेरे बिना

बस एक बार तू देख ले तो कभी तन्हा ना छोड़े मुझे

मयखाने से पूछा आज इतना सन्नाटा क्यों है

बोला साहब लहू का दौर है शराब कौन पीता है

पहले तो यूँ ही गुज़र जाती थी रात

मोहब्बत हुई तो रातों का अहसास हुआ

तुम उदार हो इस दुनिया पर इतनी दया दिखा देना

प्रेम भुलाऊ कैसे तुम्हारा इतना मुझे बता देना

कैसे कह दूँ तुमसे हमें मोहब्बत नहीं

मुंह से निकला झूठ एक दिन आँखों से पकड़ा जायेगा

Dard ki baarishon me hum akele hi the

Jab barsi khushiyan najane bheed kahan se aayi

दम तोड़ देती है माँ-बाप की ममता जब बच्चे कहते है

तुमने किया ही क्या है हमारे लिए

किसी के वादे पर क्यों एतवार किया हमने

ना आने वालों का क्यों इंतजार किया हमने

वक़्त की रफ़्तार कभी बदलती नहीं

बस ज़िन्दगी की रफ़्तार बदल जाती है

तुझे देखकर ही शुरू होती है मेरी हर सुबह

फिर कैसे कह दूँ के मेरे दिन खराब है

ना जाने क्यो दिन निकलते ही उदास हो जाता हुँ

महसूस होता है कि कोई भूल रहा है हमे धीरे-धीरे

सारी दुनिया की खुशी अपनी जगह

उन सबके बीच तेरी कमी अपनी जगह

सिलने उधड़ गई हैं जैसे यादें धूमिल हो जाती हैं

कुछ को जोड़ना हैं धागों से कुछ तो टूट जानी हैं

मेरी खुद्दारी इजाज़त नही देती

कैसे कहूँ कि मुझे तेरी जरुरत है

ढूंढने पर वही मिलेंगे जो खो गए हैं

वो कभी नहीं मिलेंगे जो बदल गए हैं

इसी बात ने उसे शक मेँ डाल दिया हो शायद

इतनी मोहब्बत उफ्फ कोई मतलबी ही होगा

लाश पता नही किस बदकिस्मत की थी मगर

क़ातिल के पैरो के निशान बड़े हसीन थे

कर कुछ मेरा भी इलाज ऐ हकीम-ए-मोहब्बत

जिस दिन उसकी याद नहीं आती सोया नहीं जाता

वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है

ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है

er kasz

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